February11 , 2026

    मध्यप्रदेश में 55-57 लाख फर्ज़ी मतदाता होने का दावा: पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ ने चुनाव आयोग पर उठाए सवाल

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    भोपाल, 13 जुलाई 2025: शंखनाद 
    पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस नेता श्री कमलनाथ ने एक ट्वीट के माध्यम से बड़ा दावा करते हुए कहा है कि मध्य प्रदेश में करीब 55 से 57 लाख फर्ज़ी मतदाता दर्ज हैं, जो कि प्रदेश के कुल मतदाताओं का लगभग 8-10% हैं। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि इन्हीं मतदाताओं के आधार पर वर्ष 2023 का विधानसभा चुनाव आयोजित किया गया था, जिसकी निष्पक्षता अब संदेह के घेरे में है।

    कमलनाथ ने बताया कि 2023 के चुनाव से पहले कांग्रेस पार्टी ने बार-बार निर्वाचन आयोग को इन फर्ज़ी मतदाताओं की शिकायत की थी। पार्टी ने कई ऐसे मामलों की जानकारी दी थी, जहाँ एक ही पते पर 100 से अधिक मतदाता पंजीकृत पाए गए। उन्होंने यह भी कहा कि इन मकानों के फोटोग्राफ भी निर्वाचन आयोग को सौंपे गए थे, लेकिन बावजूद इसके कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई।

    कमलनाथ ने 2018 और 2023 के विधानसभा चुनावों के वोट प्रतिशत की तुलना करते हुए संदेह जताया कि फर्ज़ी मतदाताओं की वजह से चुनाव परिणाम प्रभावित हुए। उन्होंने बताया कि 2018 में कांग्रेस और भाजपा का वोट प्रतिशत लगभग बराबर 40% था, जबकि 2023 में कांग्रेस का वोट प्रतिशत स्थिर रहा और भाजपा के वोट में अचानक 8% की वृद्धि देखी गई।

    उन्होंने सवाल किया कि क्या यह महज संयोग है कि जितनी संख्या में फर्ज़ी मतदाता सामने आए हैं, उतना ही अतिरिक्त वोट भाजपा को 2023 में मिले?

    इस मुद्दे को गंभीर बताते हुए कमलनाथ ने कहा कि अब समय आ गया है कि जनता अपने मताधिकार को लेकर जागरूक बने और प्रत्येक योग्य मतदाता अपना नाम पंजीकृत कराए, जबकि अयोग्य मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटाए जाएं।

    कमलनाथ ने यह भी स्पष्ट किया कि फर्ज़ी मतदाताओं की पहचान संभव हो रही है क्योंकि अब वोटर आईडी को आधार कार्ड से लिंक किया जा रहा है। उन्होंने चुनाव आयोग से मांग की कि आधार कार्ड को मतदाता पहचान पत्र के लिए अनिवार्य दस्तावेजों में शामिल किया जाए।

    उन्होंने महाराष्ट्र में भी इसी तरह के मामलों की ओर ध्यान दिलाया, जहाँ नेता प्रतिपक्ष श्री राहुल गांधी स्वयं फर्ज़ी वोटरों की संख्या में वृद्धि का मुद्दा उठा चुके हैं।

    यह मामला आने वाले समय में राजनीतिक गलियारों में नई बहस को जन्म दे सकता है, और निर्वाचन प्रक्रिया की पारदर्शिता पर एक बार फिर सवाल खड़े हो सकते हैं।

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